शिंदे का छूटा साथ तो उद्धव ने खोजा नया पार्टनर! क्या बदल पाएंगे सियासी गणित?

Aajtak | 1 month ago | 02-12-2022 | 03:58 pm

शिंदे का छूटा साथ तो उद्धव ने खोजा नया पार्टनर! क्या बदल पाएंगे सियासी गणित?

महाराष्ट्र में सत्ता से बेदखल होने के बाद से उद्धव ठाकरे खेमा अपने सियासी समीकरण को मजबूत करने में जुटी है. उद्धव ठाकरे ने बाबा साहब अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ हाथ मिला लिया है. बीएमसी चुनाव में प्रकाश अंबेडकर शिवसेना (उद्धव गुट) के साथ मिलकर लड़ेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि यह गठबंधन क्या बीजेपी-एकनाथ शिंदे को मात दे पाएगा?महाराष्ट्र में बहुत जल्द बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी सहित कई शहरी निकाय चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद मई, 2024 में लोकसभा और नवंबर, 2024 के विधानसभा चुनाव भी है. महाराष्ट्र की सत्ता गंवाने और शिवसेना के दो धड़ों में बंट जाने के बाद उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी को बचाए रखनी की चुनौती खड़ी हो गई है. बीएमसी पर तीन दशक से काबिज शिवसेना को बेदखल करने के लिए बीजेपी-शिंदे गुट एकजुट है.शिव शक्ति और भीम शक्ति का मिलनबीएमसी चुनाव सिर पर है और उद्धव ठाकरे की कोशिश अपने शिवसेना को फिर से खड़ा करने की है. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सांसद, विधायक, शिवसैनिक उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ कर जा चुके हैं. ऐसे में उद्धव ठाकरे को एक ऐसा जोड़ीदार चाहिए जो उन्हें सियासी मजबूती दे सके. इसी मद्देनजर उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव से मुलाकात कर उत्तर भारतीय वोटों को साधने का दांव चला है तो उद्धव ने प्रकाश अंबेडकर के साथ बीएमसी चुनाव के लिए गठबंधन किया है. ऐसे में दोनों दलों की दोस्ती को 'शिव शक्ति और भीम शक्ति' गठबंधन का नाम दिया जा रहा है.महाराष्ट्र की सियासत के लिहाज से उद्धव ठाकरे और प्रकाश अंबेडकर का गठबंधन निश्चित रूप से बेहद अहम है. प्रकाश अंबेडकर ने कहा कि उद्धव ठाकरे को यह तय करना होगा कि वह कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन बनाए रखें या नहीं या फिर वंचित बहुजन आघाडी को गठबंधन के चौथे सहयोगी के रूप में लें. ऐसे में प्रकाश अंबेडकर ने उद्धव ठाकरे के ऊपर छोड़ दिया है.हालांकि. उद्धव ठाकरे की रणनीति है कि वो महा विकास आघाडी गठबंधन में कांग्रेस और एनसीपी को साथ बनाए रखते हुए कुछ नए साझीदारों को भी शामिल करने की है. इसी मद्देनजर प्रकाश अंबेडकर की पार्टी को लेकर उद्धव महाराष्ट्र की सियासत में दलित-मराठा-ओबीसी-मुस्लिम कैंबिनेशन को मजबूत करने का दांव चल रहे हैं ताकि बीजेपी-एकनाथ शिंदे के गठबंधन को कड़ी चुनौती दे सकें.दरअसल, शिवसेना का विभाजन होने के बाद उद्धव ठाकरे का गुट सियासी तौर पर कमजोर पड़ा है. महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद बीजेपी-शिंदे की नजर बीएमसी से भी उद्धव ठाकरे गुट के शिवसेना को बेदखल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है. इतना ही नहीं कांग्रेस बीएमसी चुनाव अकेले दम पर लड़ने पर विचार-विमर्श कर रही है. एनसीपी का मुंबई में कोई खास आधार नहीं है. ऐसे में उद्धव ठाकरे को बीएमसी की लड़ाई खुद के दम पर लड़नी पड़ रही है. इसीलिए उद्धव ठाकरे अभी से सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुट गए हैं ताकि मुंबई की सियासत में कम से अपने को बचाए रख सके.हिन्दुत्व और सेकुलर पॉलिटिक्स का मेलउद्धव ठाकरे की शिवसेना जहां हिंदुत्व की राजनीति करने के लिए जानी जाती है तो प्रकाश आंबेडकर सेक्युलर और दलित राजनीति करते हैं. 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जब शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई थी, तभी उद्धव ठाकरे ने यह संकेत दे दिया था कि वह अब हिंदुत्व की राजनीति तो करेंगे लेकिन सत्ता में रहने के लिए सेक्युलर दलों के साथ तालमेल भी बढ़ाएंगे. इसी फॉर्मूले पर उद्वव ठाकरे ने ढाई साल तक सरकार चलाई, लेकिन इसी साल जून में हुई बगावत से सत्ता गवांने पड़ी है.महाराष्ट्र की सत्ता भले ही उद्वव ठाकरे ने गवां दिया हो, लेकिन बीएमसी से अपनी पकड़ को कमजोर होने नहीं देना चाहती है. इसीलिए उद्धव खेमा अपने सियासी आधार को मजबूत करने के लिए हरसंभव कोशिश में जुटा है ताकि किसी तरह की कोई गुंजाइश बीजेपी-शिंदे गुट के लिए न रह जाए. राहुल गांधी से लेकर नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रकाश अंबेडकर तक के साथ उद्धव ठाकरे अपने समीकरण बना रहे हैं.महाराष्ट्र में उद्धव की नई दोस्ती क्या असर डालेगीराजनीतिक विश्वलेषकों की माने तो वंचित बहुजन आघाडी के उद्धव ठाकरे के साथ आने से महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए कोई मुश्किल खड़ी हो सकती है. महाराष्ट्र में अगर ओबीसी, मराठा और दलित समुदाय का बड़ा तबका एक साथ महा विकास आघाडी के साथ जुड़ जाता है तो यह बीजेपी-एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सकता है. इसके अलावा उत्तर भारतीय वोटों को जोड़ने के लिए उद्धव खेमा मशक्कत कर सकता हैबता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वंचित बहुजन आघाडी का असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ मिलकर उतरने से कांग्रेस-एनसीपी को 8 से 10 सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था. इन लोकसभा क्षेत्रों में प्रकाश अंबेडकर की पार्टी के प्रत्याशी एक लाख से ज्यादा वोट हासिल हुए थे. औरंगाबाद सीट को ओवैसी की पार्टी जीतने में कामयाब भी रही थी, क्योंकि दलित और मुस्लिम वोट एक जुट हो गए थे. ओवैसी और प्रकाश अंबेडकर ने जय भीम और जय मीम का नारा दिया था. यह दांव सफल रहा था.2019 के विधानसभा चुनाव में भी वंचित बहुजन आघाडी और कांग्रेस एनसीपी के बीच वोटों का बंटवारा होने की वजह से बीजेपी को 32 सीटों को फायदा मिला था. ऐसे में प्रकाश अंबेडकर का उद्धव के साथ आने का महा विकास अघाड़ी के लिए सियासी तौर पर फायदेमंद साबित हो सकता है और बीजेपी के लिए टेंशन पैदा कर सकता है?

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